Fagun ke Mausam - 40 in Hindi Fiction Stories by शिखा श्रीवास्तव books and stories PDF | फागुन के मौसम - भाग 40

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फागुन के मौसम - भाग 40

 भाग- 40

 

दिवाली की वो शाम आ चुकी थी जब अमावस्या होने के बावजूद पूरे शहर में कहीं अँधकार का नामों-निशान भी नज़र नहीं आ रहा था।

 

जानकी ने लीजा और मार्क के साथ मिलकर विधिवत अपने घर में लक्ष्मी-गणेश की पूजा की और फिर प्रसाद लेकर वो तीनों राघव के घर चल दिए।

 

अभी राघव के घर पर नंदिनी जी ने पूजा शुरू ही की थी।

जानकी को देखते ही नंदिनी जी ने उसे आरती की थाली देते हुए कहा, “आओ बेटा, आज तुम यहाँ आरती करो।”

 

जानकी की मधुर आवाज़ में आरती सुनता हुआ राघव मानों सम्मोहित सा हो गया था।

आरती के समाप्त होने के पश्चात जब जानकी ने कपूर की लौ राघव के सामने की तब उस पर अपनी हथेलियां फेरते हुए राघव ने एक क्षण ठहरकर जानकी को देखा और फिर आरती लेकर लीजा और मार्क के साथ बाहर चला गया।

 

जानकी जब तक पूजा कक्ष से बाहर आई तब तक तारा भी अविनाश और अंजली के साथ वहाँ आ चुकी थी।

 

उन सबने मिलकर पहले तो दिवाली की मिठाई खाई और फिर उन्होंने एक के बाद एक रोशनी वाले अनगिनत पटाखे जलाने शुरू किए।

 

राघव ने जैसे ही एक बॉम्ब जलाने के लिए निकाला, जानकी ने सहमते हुए कहा, “प्लीज राघव, इसे मत जलाओ।”

 

“ओहो, तुम और तुम्हारा ये डर न जाने कब जाएगा। हर वर्ष दिवाली पर हमें भी तुम ऐसे ही परेशान करती हो।” मार्क ने चिढ़ते हुए कहा तो राघव बोला, “हर वर्ष मतलब? क्या तुम तीनों हमेशा साथ रहते हो?”

 

मार्क समझ नहीं पाया कि वो अब क्या कहे तो बात सँभालते हुए लीजा बोली, “दरअसल होली और दिवाली ये दो त्योहार जो हमें बहुत पसंद है इनके अवसर पर हम जानकी के पास चले जाते हैं ताकि उसके साथ हम भी ये त्योहार मना सकें।”

 

“ये तो बहुत ही अच्छी बात है। चलो फिर इसी बात पर ये बॉम्ब फोड़ा जाए।” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर उसने एक फुलझड़ी जलाकर उससे बॉम्ब के धागे में आग लगा दी।

 

बॉम्ब बस फटने ही वाला था कि जानकी ने डरकर अपनी आँखें बंद कर लीं और पास ही खड़े राघव की बाँह को उसने ज़ोर से पकड़ लिया।

 

जानकी की ये पकड़ इतनी मजबूत थी कि एकबारगी राघव के मुँह से आह निकल गई लेकिन पटाखों के शोर में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया।

 

बॉम्ब के फट जाने के बाद राघव ने धीमे स्वर में जानकी से कहा, “अब मेरा हाथ छोड़ दो वर्ना वहाँ निशान पड़ जाएगा।”

 

“आई एम रियली वेरी सॉरी।” जानकी ने झेंपते हुए कहा और फिर वो अंदर नंदिनी जी के पास जाकर सबके लिए खाना लगाने में उनकी मदद करने लगी।

 

जब सारा खाना टेबल पर लग गया तब नंदिनी जी ने उन सबको आवाज़ दी।

 

बातों और कहकहों के तड़के के बीच जब खाने-पीने का दौर खत्म हो गया तब अगले दिन राघव के जन्मदिन और गेम लॉन्च के इवेंट में उससे मिलने की बात कहकर तारा अविनाश और अंजली के साथ अपने घर के लिए निकल गई।

 

जानकी ने भी अब जाने की इज़ाज़त माँगी तो राघव ने उसे एक मिनट रुकने के लिए कहा और फिर उसने अपने कमरे से एक पैकेट लाकर जानकी को देते हुए कहा, “ये तुम्हारे लिए दिवाली का छोटा सा गिफ्ट है।”

 

“इतने बड़े पैकेट को तुम छोटा सा गिफ्ट कह रहे हो राघव? सॉरी मैं इसे नहीं ले सकती हूँ।” जानकी ने मना करते हुए कहा तो राघव बोला, “पर क्यों?”

 

“बस यूँ ही।”

 

“या तो तुम मुझे इस यूँ ही का स्पष्ट अर्थ बताओ या फिर अपने दोस्त के इस गिफ्ट को एक्सेप्ट कर लो।”

 

जानकी ने अब राघव की आँखों में देखा जहाँ उसे बचपन की तरह ही चिपरिचित ज़िद की झलक नज़र आई, इसलिए कोई सीन क्रिएट होने से पहले ही उसने पैकेट लेते हुए कहा, “थैंक्यू मेरे दोस्त, तुम्हारा गिफ्ट मुझ पर उधार रहा।”

 

“डोंट वरी, मैं सूद समेत वसूल लूँगा।” राघव ने हँसते हुए कहा तो जानकी भी मुस्कुरा उठी।

 

अपने घर आकर जब जानकी ने राघव का दिया हुआ पैकेट खोला तब उसने देखा उसमें चार साड़ियां थीं, जिनमें से एक वही बनारसी साड़ी थी जिसे वो तारा के साथ उसकी साड़ियों की खरीददारी करवाते समय देखकर मन मसोसकर रह गई थी।

इस साड़ी को किनारे रखकर जानकी ने दूसरी साड़ी को देखा जिस पर एक चिट भी लगी थी।

 

इस चिट पर राघव ने लिखा था, “अगर तुम कल के इवेंट में इसे पहनोगी तो मुझे बहुत खुशी होगी।”

 

बाकी दो साड़ियां जिनमें से एक पीले रंग की थी और दूसरी हरे रंग की उन्हें देखते ही जानकी समझ गई कि राघव ने बहुत सोच-समझकर तारा के विवाह कार्यक्रम के लिए उसे ये साड़ियां दी हैं।

 

साड़ियों को किनारे रखकर जानकी ने अब इनके साथ रखा हुआ लकड़ी का एक खूबसूरत नक्काशीदार बॉक्स खोला।

 

इस बॉक्स में लुंबिनी से खरीदी गई माला के साथ-साथ लखनऊ में खरीदे गए झुमके, पायल और सभी साड़ियों से मेल खाती हुई चूड़ियों और बिंदी का पूरा सेट था।

 

ये सब कुछ देखते हुए सहसा जानकी की आँखों से आँसू बह चले।

उसका जी चाह रहा था कि वो बस इसी क्षण दौड़ते हुए जाकर राघव के गले लग जाए और उसे सारा सच बता दे कि वो कौन है।

 

अभी वो इस विषय में सोच ही रही थी कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी।

उसने मोबाइल उठाकर देखा तो उसकी स्क्रीन पर शारदा जी का नाम फ़्लैश हो रहा था।

 

उनकी आवाज़ कानों में पड़ते ही जानकी ने अभी एक क्षण पहले कमज़ोर पड़ रहे अपने मन को एक बार फिर दृढ़ कर लिया कि जहाँ उसने आठ महीने बनारस में नकली पहचान के साथ बिता लिए तो अब बस कुछ दिन और सही।

ऐसा न हो कि बिना सोचे-समझे हड़बड़ी में इमोशनल होकर वो राघव को सारा सच बता दे और फिर राघव उससे दूर छिटक जाए।

 

राघव से दूर होने के ख़्याल भर से ही जानकी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके दिल में अनगिनत काँटे चुभा दिए हैं।

बड़ी मुश्किल से ख़ुद को संयत करते हुए अपनी माँ से बात करके जब उसने फ़ोन रखा तब अगले ही मिनट एक बार फिर उसके मोबाइल की घंटी बजी।

 

इस बार स्क्रीन पर राघव का नाम देखकर जानकी ने झट से फ़ोन उठा लिया तो दूसरी तरफ से राघव की व्याकुल आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “तुमने गिफ्ट देखा?”

 

“हाँ देख लिया।”

 

“तुम्हें पसंद आया?”

 

“बहुत ज़्यादा। लेकिन राघव तुम्हें मुझे इतने महँगे गिफ्ट्स देने की क्या ज़रूरत थी? सब क्या सोचेंगे?”

 

“कौन सब?”

 

इस प्रश्न के उत्तर में जब जानकी चुप रही तो राघव ने कहा, “अब अगर तीस वर्ष की उम्र में भी मैं यही सोचकर जीता रहूँ कि लोग क्या सोचेंगे तब तो हो चुका मेरा कल्याण।

इसलिए बेहतर होगा कि तुम भी दूसरों के बारे में सोचना छोड़ दो।

हाँ अगर इसके अलावा तुम्हें किसी और कारण से मेरे गिफ्ट्स से प्रॉब्लम है तो तुम मुझे खुलकर बता सकती हो।

आख़िर इतना अधिकार तो हम दोनों ने एक-दूसरे को दे ही दिया है।”

 

“नहीं और कोई बात नहीं है। मुझे बस यही लग रहा था कि दफ़्तर में सब क्या सोचेंगे कि आख़िर तुम मुझ पर इतने फेवर क्यों कर रहे हो?”

 

“हैलो मैडम, मैंने कोई फेवर नहीं किया है। अगर आप दफ़्तर में अपना काम ठीक से नहीं करेंगी, ज़्यादा छुट्टी लेंगी या समय से नहीं आएंगी तो आपकी भी सैलरी वैसे ही कटेगी जैसे दूसरों की कटती है और आपकी क्लास भी लगाई जाएगी।

समझ गईं न आप?”

 

“बिल्कुल समझ गई बॉस, इसलिए तो मैंने अपने काम में दिन-रात एक कर दिया है।”

 

“हम्म... मुझे आप पर गर्व है।”

 

“थैंक्यू सो मच।” जानकी ने खिलखिलाते हुए कहा तो उसकी मुस्कुराहट की चमक अपने आस-पास महसूस करते हुए राघव बोला, “चलो अब कल शाम की पार्टी में हमारी मुलाकात होगी।”

 

“हाँ, कल हम सबके लिए बहुत बड़ा दिन है।”

 

“मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा।” कहकर जब राघव ने फ़ोन रख दिया तब जानकी ने सारे गिफ्ट्स को वापस पैकेट में डालकर उन्हें अलमारी में रखा और फिर उस पैकेट को खोलकर देखने लगी जिसमें उसने राघव के लिए उसके जन्मदिन का गिफ्ट रखा हुआ था।

 

अपने गिफ्ट से संतुष्ट होने के बाद उसने कमरे की बत्ती बंद की और ख़ुद को राघव के ख़्यालों और सपनों के हवाले कर दिया।

 

राहुल इवेंट मैनेज़र पांडेय के साथ मिलकर राघव के जन्मदिन के साथ-साथ गेम लॉन्च इवेंट का पूरा दायित्व सँभाल रहा था।

 

यहाँ की डेकोरेशन से लेकर मेन्यू तक सब कुछ उसने राघव के लिए सरप्राइज़ रखा था।

 

राघव को सख़्त हिदायत दी गई थी कि वो वेन्यू पर सीधे पार्टी शुरू होने के समय ही पहुँचे।

 

इस हिदायत की कद्र करते हुए जब राघव नंदिनी जी और दिव्या जी के साथ इन्विटेशन कार्ड पर लिखे हुए पते पर पहुँचा तब वहाँ की अरेंजमेंट देखकर वो भी एक पल के लिए भौंचक्का रह गया।

 

उसे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि उसकी पूरी टीम आज के इवेंट को इतने शानदार तरीके से प्रेजेंट करेगी।

 

अंदर आते हुए उसने जब राहुल और पांडेय को विशेष रूप से धन्यवाद दिया तब उन्होंने इसे मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लिया।

 

तारा और यश भी अपने पूरे परिवार के साथ आ चुके थे।

 

एक-एक करके जब मेहमानों का आगमन शुरू हुआ तब प्रवेश द्वार पर तैनात मंजीत ने हाथ जोड़कर सभी मेहमानों का मुस्कुराते हुए अभिवादन किया और पास ही स्थित मेज़ पर रखे हुए छोटे-छोटे बुकेज़ उन्हें देकर उनका स्वागत किया, जहाँ से विकास, हर्षित और राहुल उन सबको ससम्मान अपने साथ अंदर ले गए।

 

तारा के साथ सभी मेहमानों से मिलते हुए और उनकी बधाइयां स्वीकार करते हुए राघव की नज़रें बार-बार प्रवेश द्वार की तरफ जा रही थीं।

 

उसकी ये बेचैनी देखकर तारा मंद-मंद मुस्कुरा ही रही थी कि तभी जानकी भी लीजा और मार्क के साथ वहाँ पहुँची।

 

जानकी को देखते ही राघव की नज़रें एक क्षण के लिए उसके ऊपर ठहर सी गईं जो वही साड़ी पहनकर आई थी जिसे राघव ने आज के इवेंट के लिए खासतौर से उसे दिया था।

 

इससे पहले कि वो जानकी के पास जाता, राहुल ने जानकी को अपने पास मंच पर बुला लिया जहाँ उन्होंने प्रोजेक्टर पर इतिहास आधारित अपने नए गेम की कुछ झलकियां मेहमानों के लिए प्रस्तुत कीं।

 

इन झलकियों के साथ-साथ जानकी सबको बताती जा रही थी कि गेम के किस पार्ट का संबंध लुंबिनी और कपिलवस्तु के किस स्थान की यात्रा और वहाँ मौजूद किस इमारत से है।

 

जानकी ने ये सारी जानकारी इतने रोचक अंदाज़ में दी कि इन झलकियों के समाप्त होने के बाद सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

 

इस क्षण राघव की आँखों में अपने लिए गर्व का भाव देखते हुए जानकी का मन जैसे भावविभोर हो उठा था।

 

अब राहुल ने नंदिनी जी और पीए साहब से मंच पर आने का आग्रह किया।

जब वो दोनों मंच पर पहुँचे तब विकास ने उनके सामने एक मेज़ रखी जिस पर नए गेम की कई सीडीज़ रखी हुई थीं और इनमें से सबसे ऊपर वाली सीडी पर लाल रिबन बंधा हुआ था।

 

पीए साहब के साथ मिलकर नंदिनी जी ने इस सीडी पर लगे हुए रिबन को काटकर जब ऑफिशियली इस गेम को लॉन्च किया तब एक बार फिर सबकी तालियों की गूँज सुनकर राघव और उसकी पूरी टीम के हौसले मानों बुलंद हो गए।

 

राघव और तारा ने अब एक-एक करके सभी मेहमानों को इस गेम की सीडी बतौर उपहार दी जिसके बाद तारा ने राघव से उसके जन्मदिन का केक काटने के लिए कहा।

 

केक काटने के बाद राघव ने सबसे पहले उसका एक टुकड़ा नंदिनी जी को और फिर दिव्या जी को खिलाया, जिसके बाद वेटर आकर केक ले गया ताकि वो सभी मेहमानों को केक सर्व कर सके।

 

जब तारा को केक की प्लेट मिली तब उसने उसमें से एक टुकड़ा राघव को खिलाते हुए उसे जन्मदिन की बधाई दी।

 

अपनी प्लेट हाथ में थामे हुए राघव ने जानकी की तरफ देखा जो नंदिनी जी के पास खड़ी थी।

 

राघव ने जब उसे संकेत से अपने पास बुलाया तब एक बार फिर उसे जन्मदिन की बधाई देते हुए जानकी ने कहा, “बॉस, क्या आप दो मिनट के लिए मेरे साथ बाहर पार्किंग में चल सकते हैं?”

 

“हाँ, क्यों नहीं।” राघव ने आगे बढ़ते हुए कहा तो जानकी भी उसके पीछे चल पड़ी।

 

बाहर आने के बाद जानकी ने पहले तो राघव को अपने हाथों से केक खिलाया और फिर अपनी प्लेट उसे थमाकर उसने अपनी गाड़ी से एक छोटा सा पैकेट निकालकर राघव को देते हुए कहा, “ये मेरी तरफ से आपके लिए छोटा सा गिफ्ट है।”

 

राघव ने इस पैकेट को पास ही खड़ी अपनी गाड़ी में रखा और फिर जानकी को केक खिलाते हुए उसने कहा, “थैंक्यू, तुमने मेरे गिफ्ट का मान बढ़ा दिया।”

 

प्रतिउत्तर में जानकी ने मुस्कुराते हुए जब कहा, “अब अंदर चलें?”

 

“हाँ बिल्कुल, वर्ना तुम्हारे वो लोग क्या कहेंगे?” राघव की इस चुहल पर जानकी ने मुश्किल से अपनी हँसी रोकी ही थी कि तभी मंजीत ने वहाँ आकर राघव से कहा कि पीए साहब उसे बुला रहे हैं।